1 mukhi rudraksha धारण करने की विधि

1 mukhi rudraksha

रुद्राक्ष को शिव का प्रतिरूप, उनका प्रिय आभूषण और उनके शक्ति-प्रभाव का केंद्रीभूत रूप माना जाता है, तथापि मुखों के आधार पर प्रत्येक दाने में किन्हीं अन्य देव-शक्तियों का भी समावेश रहता है। वैसे भी शिव के साथ शक्ति की उपस्थिति अनिवार्य होती है।
शिवजी का प्रभाव तो सभी दानों में रहता है, पर अन्य देवताओं की शक्ति किन्हीं विशेष दानों (मुख के आधार पर) में रहती है। अत: रुद्राक्ष का महत्व विचारणीय है।
इस नजर से एकमुखी दाना सर्वश्रेष्ठ होता है।

वैसे तो यह अलभ्य जैसा होता है, किन्तु जिसे मिल जाए, वो वह निश्चय ही परम सौभाग्यशाली हो जाता है। एकमुखी रुद्राक्ष का दर्शन, पूजन और धारण करने वाला जातक समस्त बाधाओं और संकटों से मुक्त रहता है। इसके प्रभाव से धारक को आध्यात्मिक ज्ञान और भौतिक श्रीसंपदा की प्राप्ति होती है। रुद्राक्ष की सभी श्रेणियों में एकमुखी सर्वश्रेष्ठ दाना होता है।

मुख्यत: इसे दो आकारों में देखा गया है, गोल और अर्द्ध-चंद्राकार !।

1 mukhi rudraksha चाहे जिस आकृति का हो, उसे वास्तविक और शुद्ध होना चाहिए। आजकल नकली एकमुखी दाने देकर, बेचने वाले लोग भक्तों को बेतरह लूट रहे हैं। अत: इसकी परख में अत्यंत सावधान रहना चाहिए।
यदि सौभाग्यवश यह दाना कहीं से प्राप्त हो जाए, तो इसे विधिवत् पूजा करके कंठ अथवा बाहु में धारण करना चाहिए। इस दाने की पूजा और धारण के समय इसके मंत्र का जप करना लाभकारी होता है। वैसे अनुभव में आया है कि यदि प्रत्येक दाने का मंत्र ज्ञात नहीं है, तो मात्र “ओम् नमः शिवाय” का जप करते हुए रुद्राक्ष की पूजा करके, उसे धारण कर लेना भी वैसा ही लाभकारी होता है।
नित्य प्रातः उठते ही सर्वप्रथम गले या बाहु में धारण किये हुए दाने को “ओम् नमः शिवाय” अथवा उसके विशिष्ट मंत्र द्वारा स्तवन-प्रणाम करने से व्यक्ति अनेक प्रकार के संकटों से मुक्त रहता है।

1 mukhi rudraksha

।। एकवत्र शिवः साक्षात्ब्रह्महत्यां व्ययोहति।।

एक मुखी रुद्राक्ष साक्षात् शिव है और ब्रह्म हत्या को दूर करता है।

।। रुद्राक्षधारणः पादौ प्रक्षाल्यादिभिः पिबेनरः।
सर्वपापविनिमुक्तः शिवलोके महीयते।।

जो परुष रुद्राक्ष धारण किये हुए व्यक्ति के चरण धोकर जलपान करे, तो वो सर्वपाप मुक्त होकर शिवलोक में पहुंचता है।

यः पुमामंत्रसंयुक्तं धारयेद्भुवि मानवः
रुद्रलोके वसेत्सत्यं सत्यमेतन्न संशयः।।

जो मनष्य पथ्वी पर रुद्राक्ष को मंत्र सहित धारण करते हैं, वो रुद्रलोक में जाकर वास करते हैं। इसमें कुछ भी संशय नहीं है।

पशवो हि च रुद्राक्ष धारणाद्याति रुद्रताम्।
किमु ये धारयतिस्म नरा रुद्राक्ष मालिकाम्।।

रुद्राक्ष धारण करने से पशु भी रुद्र लोक को प्राप्त होते हैं, तो फिर जो मनुष्य रुद्राक्ष की माला धारण करते हैं, उनकी बात को कौन कहे।

कंठेरुद्राक्षमाबध्य श्वापि वा म्रियते यदि।
सोऽपि मुक्तिमवाप्नोति किं पुनर्मानुषोपिऽसः।।

यदि कुत्ता भी गले में रुद्राक्ष बांधकर प्राण त्याग करे, तो वो भी मुक्त हो जाता है। -फिर मनुष्य की तो बात ही क्या है।

रुद्राक्षर्पितचेता यो रुद्राक्षस्तु न वै धृतः,
असौ महेश्वरौ लोके नमस्यः स तु लिंगवत;
अविद्यो वा सविद्यो वा रुद्राक्षस्य तु धारणात्।
शिवलोक प्रपद्यत कीटके गर्दभो यथा।

जो शिवलोक में चित्त लगाकर रुद्राक्ष धारण करता है वो शिवभक्त शिवलोक में शिव के समान नमस्कृत होता है। विद्यावान या अविद्यावान कोई भी रुद्राक्ष धारण करे तो। वह शिवलोक को प्राप्त होता है। जैसे कीटक देश में गर्दभ (गधा) मुक्त हुआ था।

केवलानपि रुद्राक्षान्यद्यालस्याद्विभार्ति यः।
तं न स्पृशंति पापानि तमांसीव विभावसुम्।

1.रुद्राक्ष धारण कैसे करे और उसका लाभ
2.रुद्राक्ष के प्रकार और लाभ
जो केवल आलस्य से भी रुद्राक्षों को धारण करता है, उसको वैसे ही पाप नहीं छू सकते। जैसे सूर्य को अंधकार !
एकमुखी रुद्राक्ष परातत्त्व का प्रकाशक है। परमतत्त्व की प्राप्ति की धारणा से इसको धारण करना चाहिए। सहज ही ईश्वर-प्राप्ति की शक्ति एकमुखी रुद्राक्ष धारण के द्वारा कही गई है।
1 mukhi rudraksha को साक्षात् “शंकर” कहते हैं। कुछ रुद्राक्ष केले और आम की भांति आपस में जुड़े हुए होते हैं। इनका यह जुड़ाव प्राकृतिक ही होता है। यादिदो रुद्राक्ष जुड़े हुए ही उत्पन्न हुए हों, तो उन्हें ‘गौरी शंकर” कहते हैं। यदि तीन रुद्राक्ष जुड़े हुए उत्पन्न हुए हों, तो उन्हें “त्रिजुगी’ कहते हैं।
चूंकि ये भी बहुत कम ही देखने को मिलते हैं, अत: दुर्लभ माने जाते हैं। इसी कारण इनका महत्व भी अधिक है। ये रुद्राक्ष शिव और शक्ति का मिश्रित स्वरूप माना जाता है। जो व्यक्ति एकमुखी रुद्राक्ष प्राप्त करने में असमर्थ हो उनके लिए ये उत्तम साबित हो सकते हैं। घर में, पूजागृह में, तिजोरी में, मंगल कामना की सिद्धि के लिए रखना शुभ फलदायक हैं।
ऐसे रुद्राक्ष को शिवलिंग से स्पर्श कराकर धारण करना चाहिए।
धारण करते समय “ओम् नमः शिवाय” का जाप करते हए पवित्र स्थान पर बैठकर धारण करें। श्रद्धा तथा विश्वास और शुद्ध मन से धारण करने वाले पर शिव-शक्ति तथा दोनों की विशेष कृपा रहती है। अनेक विदेशी विद्वानों का भी मत है कि इसे धारण करने से हिम्मत बनी रहती है

और अवश्य ही सफलता मिलती है।

गौरी-शंकर धारण करने वाले को सांसारिक लाभ तो उतने नहीं मिलते, जितने रुद्राक्षधारी को मिलते हैं, किन्तु आध्यात्मिक लाभ में कोई कमी नहीं होती।
असली गौरी-शंकर की पहचान यह है कि उस पर बनी हुई धारियां प्राकृतिक होती हैं। कुल मिलाकर एक गौरी-शंकर पर सात या आठ धारियां होंगी, किन्तु परस्पर उनमें दूरी का अंतर होता है, अर्थात् एक समान दूरी पर नहीं होती।।
असली गौरी-शंकर वज्र के समान होगा।
काफी शक्ति लगाकर भी उसे तोड़ना या दोनों रुद्राक्षों का अलग हो जाना कठिन है। यदि आप परीक्षण के रूप में किसी भारी और वजनी चीज से उसे तोड़ देंगे, तो उसके टूटे हुए भाग सपाट नहीं होंगे। उनका टूटना प्राकृतिक रूप से विखंडित होगा। इसी प्रकार यदि किसी अन्य रुद्राक्ष को भी तोड़ा जाएगा, तो उसके टूटे हुए खंड तिरछे-बांके होंगे, जैसे कोई पत्थर टूटता है। त्रिजुगी प्राकृतिक रूप से कम उत्पन्न होते हैं, इसलिए उनका मूल्य गौरी-शंकर से अधिक ही आंका जाता है।

सर्वाश्रमाणा वर्णानां स्त्रीशद्राणां

शिवात्याधार्या सदैव रुद्राक्षा। रुद्राक्ष को सभी आश्रमों वर्गों में स्त्रियों व शूद्रों को भी धारण करना चाहिए।

एकमुखी रुद्राक्ष के धारण करने की विधि

ॐ हं ॐ ऐं ॐ । इति मन्त्रः ।
अस्य श्री शिव मन्त्रस्य प्रासाद ऋषिः पंक्तिः छन्दः शिवोदेवता हंकारो बीजम् औं शक्तिः मम चतुर्वर्गसिद्धयर्थे रुद्राक्ष-धारणार्थे जपे विनियोगः।
वामदेव ऋषये नमः शिरसि, पंक्तिश्छन्दसे नमो मुखे ऋ ए ऐं नम: हदि, हं बीजाय नमो गुह्ये ओं शक्तये नमः पादयो ओम-ओम हां अंगुष्ठाभ्यां नमः, ॐ ऐं ह्रीं तर्जनीभ्यां स्वाहा, ॐ ह्रीं हूं मध्यमाभ्यां वषट् ॐ आं हैं अनामिकाभ्यां हुं ॐ ऐं ह्रौं कनिष्ठिकाभ्यां वाषट्, ॐ उंह: करतलकरपृष्ठाभ्यां फट् इति करन्यासः।। (अथाङ्गन्यास:) ॐ ॐ ह्या हृदयाय नमः। ॐ ऐं ह्री शिरसे स्वाहा । ॐ हूँ हूं शिखाये वषट् । ॐ औं हैं कवचाय हुँ। ॐ ऐं ह्रौं नेत्रत्रयाय वौषट् । ॐ ॐ हः अस्त्राय फट् ।। (अथ ध्यानम् ) मुक्तापीनपयोदमौक्तिकजपावणों मखै: पंचभिस्त्र्यक्ष राजितमीशमिन्दु मुकुट पुणन्दुकोटिप्रभम्।। शलं टंककपाणवज्रदहनान्नागेन्द्रघंटाशुक हस्ताब्जेष्वभयवराश्चदधत जाज्जल चिन्तये 11111 एवं ध्यात्वा मानसोपचारे: संपूज्य कुर्याज्ज्पसहस्रक

तदनन्तरमाभिमुख्यसामीप्यं घटोपरि ताम्रपात्रं निधाय तत्र रुद्राक्षं क्षिप्त्वा पंक्तिप्राणायायं कृत्वा। पश्चात् बामे जलपात्रं धृत्वा यत्र तले सव्यहस्तं धृत्वा दक्षिणपाणिना सहस्रजपं कुर्यात्। पुनस्तस्योपरि जलं क्षिपेत् रुद्राक्षं धारयेत्। एवं सर्वत्र वेधिज्ञेयः
इति एकमुखी।।
नोट-1 mukhi rudraksha साक्षात् शिव-रूप है। वो भोग और मोक्षरूपी फल दाता है। जहां रुद्राक्ष की पूजा होती है, वहां से लक्ष्मी दूर नहीं जाती, उपद्रव नष्ट होते हैं और सभी कामनाएं पूर्ण होती हैं। इसे निम्न मंत्र से धारण करना चाहिए।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here