11 mukhi rudraksha को धारण करने की विधि एवं लाभ

 ग्यारहमुखी रुद्राक्ष

सर्वजयी, सर्वमोहक और सर्वत्र वैभव-समृद्धिकारी इस रुद्राक्ष में भगवान शिव की विभिन्न शक्तियों का केंद्र रहता है। उसे शिवजी के रुद्ररूप (ग्यारह रुद्रों) का तेज-पुंज माना गया है। शिव भक्तों के लिए यह बहुत ही उत्तम, प्रभावी और अमोघ वस्तु है।

यद्यपि यह दुर्लभ है, किन्तु यदि कहीं मिल जाए, तो उसे साक्षात् शिव मानकर धारण-पूजन करना चाहिए।

11 mukhi rudraksha

 

वक्तत्रैकादश रुद्राक्षो रुद्रैकादशकं स्मृतम्,
शिखायां धारयेद्यो वै तस्य पुंयफलं श्रृणु।
अश्वमेघ सहस्त्रस्य वाजपेयशकस्य च,
गवां शतसहस्त्रस्य सम्यग्दत्तस्य यत्फलम्।
तत्फलं लभते शीघ्रं वकोकादशधारणात्।।

ग्यारहमुख वाला रुद्राक्ष साक्षात रुद्र है। जो इसे शिखा में धारण करता है, उसके पुण्य फल को सुनो-एक हजार अश्वमेघ यज्ञ, एक सी वाजपेय यज्ञ और सौ हजार गेष्टा का जो फल है, वो ग्यारहमुखी रुद्राक्ष के धारण करने वाले को शीघ्र मिलता है।
11 mukhi rudraksha
1.10 मुखी रुद्राक्ष को धारण करने की विधि एवं लाभ
2.7 मुखी रुद्राक्ष को धारण करने की विधि एवं लाभ
3.rudraksha ki mahima benifits labh

11 mukhi rudraksha के ग्यारह रुद्र देवता हैं। इन्द्र भी इसके स्वामी कहलाते हैं। कुछ दान करने की अभिलाषा रही हो, किन्तु दान न कर पाया हो,

तो ग्यारहमुखी रुद्राक्ष शिखा में धारण कर लेने से दान की पूर्ति हो जाती है, क्योंकि हजारों गायों को दान का जो पुण्यफल है, वह इसको पहनने वाले को मिलता है।
इसको धारण करने से मनुष्य सर्वत्र विजयी होता है। इसे निम्न मंत्र से धारण करना चाहिए

“ओम् ह्रीं हुं नमः”

एकादशमुखी रुद्राक्ष के धारण करने की विधि

ॐ रूं क्षूं मूं यूं औं। इति मन्त्रः ।
अस्य श्रीरुद्रमन्त्रस्य कश्यप ऋषि: अनुष्टुप्छन्दः रुद्रो देवता बीजं यूं शक्तिः अभीष्ट सिद्धयर्थे रुद्राक्षधारणार्थे जपे विनियोगः। कश्यप ऋषये नम:शिरसि, अनुष्टुप्छन्दसे नमो मुखे, रुद्र देवतायै नमो हृदि, रूं बीजाय नमो गुहो, भुं शक्तये नमः पादयोः। (अथ करन्यासः) ॐ ॐ अंगुष्ठाभ्यां नमः ॐ रूं तर्जनीभ्यां स्वाहा, ॐ ७ मध्यामाभ्यां वषट्, ॐ मं अनामिकाभ्यां हुँ, ॐ यूं कनिष्ठकाभ्यां वौषट्, ॐ औं करतलकरपृष्ठाभ्यां फट्। (अथामन्यासः) ॐ ॐ हृदयाय नमः, ॐ रूं शिरसे स्वाहा, ॐ शं शिखायै वषट, ॐ मुं कवचाय हुं ॐ यूं नेत्रत्रयाय वौषट् ॐ औं अस्त्राय फट् । (अथ ध्यानम्) वालाकांयुततेजसं धृतजटाजूटेन्दुखण्डोज्जवलं नागेन्द्रैः कृतशेखरं जपवर्टी शूलं कपालं करैः। खट्वांगं दधतं त्रिनेत्रविलसत्पंचाननं सुन्दरं व्याघ्रत्वक्पारधानमन्जनिलयं श्रीनीलकण्ठं भजेत्।
।। iइति एकादशमुखी.।।

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