13 mukhi rudraksha को धारण करने की विधि एवं लाभ

13 mukhi rudraksha
तेरहमुखी रुद्राक्ष

शिव और शक्ति के समन्वित प्रभाव का केंद्र; यह तेरहमुखी यह बहुत खोजने पर  ही कदाचित् कहीं मिल पाता है। यह भी अनेक प्रकार से प्रभावशाली होता  है। ज्ञान , तर्कशक्ति, आध्यात्मिक-उत्कर्ष और भौतिक सद्धि की सभी कामनाये  इसकी उपासना से पूरी हो जाती हैं।

तेरहमखी रुद्राक्ष के देवता कामदेव हैं। यह दाना (रुद्राक्ष) काम और रस रसायन को सिद्ध प्रदान करने वाला है। इसके धारण करने वाले को सब प्रकार के भोग प्राप्त होते हैं। किसी बंधुबांधव को मारे हुए का पाप छुड़ाने के लिए इसको धारण करना चाहिए।

13-mukhi-rudraksha

वक्त्रत्रयोदशो वत्स रुद्राक्षो यदि लभ्यते,
कार्तिकेय समोज्ञेयः सर्वकामार्थ सिद्धिदः।
रसो रसायनं चैव तस्य सर्व प्रसिद्धयति,
तस्यैव सर्वभोग्यानि नात्र कार्या विचारणा।
मातरं पितरं चैव भ्रातरं वा निहंति यः,
मुच्यते सर्व पापेभ्यो धारणातस्य षण्मुखं।

हे षण्मुख ! यदि 13 mukhi rudraksha प्राप्त हो जाए, तब वह कार्तिकेय के समान सब अर्थ और कामना देने वाला होता है। उसको रस-रसायन सब सिद्ध होते हैं; उसको सबके सब भोग प्राप्त होते हैं। इसमें विचार की आवश्यकता नहीं कि जो माता-पिता व भाई को भी मारता है वो उसके धारण से उस पाप से छुटकारा पा जाता है।

तेरह मुख वाल रुद्राक्ष विश्वदेवों का स्वरूप है, जो सौभाग्य मंगलकारी है, अभीष्ट सिद्धि देने वाला है। इसे निम्न मंत्र से धारण करना चाहिए
1.gems stone ratna |benifits of gems stone
2.benifits of Emerald stone पन्ना धारण करने की विधि

“ओम् ह्रीं नमः”

त्रयोदशमुखी रुद्राक्ष के धारण करने की विधि

ॐ ईं याँ आप ओं। इति मन्त्रः । अस्य श्रीइन्द्र मन्त्रस्य ब्रह्मा ऋषिः पंक्तिः छन्दः इन्द्रो देवता ईं बीजम् आप इति शक्तिः रुद्राक्षधारणार्थे जपे विनियोगः। ब्रह्मा ऋषये नमः शिरसि। पंक्तिः छन्दसे नमो मुखे। इन्द्रो देवतायै नमो हदि । ईं बीजाय नमो गुहा। आप इति शक्तये नमः पादयोः। (अथ करन्यासः) ॐ ॐ अगुष्ठाभ्यां नमः। ॐ ईं तर्जनीभ्यां स्वाहा, ॐ यां मध्यमाभ्यां वषट्। ॐ आप अनामिकाभ्यां हुँ। ॐ ॐ कनिष्ठकाभ्यां वौषट् । ॐ ईं या आप औं करतलकरपृष्ठाभ्यां फट् (अथाङ्गन्यासः) ॐ ॐ हृदयाय नमः ॐ ई शिरसे स्वाहा यां शिखायै वषट्। ॐ आप कचवाय हुँ। ॐ ॐ नेत्रत्रयाय वौषट्, ॐ ई यां आप ॐ अस्त्राय फट् । (अथ ध्यानम्) पीतवर्ण सहस्त्राक्ष वज्रपद्मधरं विभुम्। सर्वालंकारसंयुक्त नौमीन्द्रादिकमीश्वरम्।।

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