14 प्रकार के रुद्राक्ष और लाभ | rudraksha

Rudraksha

चौदह प्रकार के रुद्राक्ष और लाभ

1.
।।एकवत्र शिवः साक्षात ब्रह्महत्यां व्यत्रोहति।।

भावार्थ : एकमुखी रुद्राक्ष (rudraksha) साक्षात शिव है और ब्रह्म हत्या से मुक्ति प्रदान करने वाला है।

2.
।।द्धिवक्त्रो देव देव्यौस्या द्धिविधं नाशायेदद्यम।।

भावार्थ : दो मुखी रुद्राक्ष देवी एवं देवता स्वरूप है, अनेकों पाप कर्म से मुक्ति दिलाता है।

3.
।।त्रिवक्त्रस्त्वनलः साक्षात्स्त्रीहत्यां दहति क्षजात्।।

भावार्थ : तीन मुखी रुद्राक्ष साक्षात अनल है। स्त्री हत्या का पाप क्षण भर में दूर करता है।

4.
।।चतुर्ववत्रः स्वयं ब्रह्मा नरहत्यां व्यपोहति।।

भावार्थ : चतुर्मुखी रुद्राक्ष स्वयं ब्रह्मा का रूप है जो नर हत्या से मुक्ति दिलाने वाला एवं उससे दूर करने वाला है।

5.
।।पञ्चवक्त्रः स्वयं रुद्रः कालाग्निनमि नामतः।।
।।अभक्ष्यभक्षणोद् भूतैरगम्यागमनोमवैः।।
।।मुच्यते सर्वपापैस्तु पचवक्त्रस्य धारणात्।।

भावार्थ : कहने का अभिप्राय यह है कि कालाग्नि नामक रुद्र स्वयं पंचमुखी रुद्राक्ष (rudraksha)है। यह अभक्ष्याभक्ष्य एवं अगम्यागमन के अपराध से मुक्ति दिलाने वाला है। और भी कई प्रकार के पाप पांच मुखी रुद्राक्ष के धारण करने से दूर हो जाते हैं।
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3.rudraksha ki mahima benifits labh

Rudraksha

6.
षड़वकाः कार्तिकेयस्तु स धार्योदक्षिणे करे।।
ब्रह्महत्यामिः पापैर्मुच्यते नात्र संशयः।।

भावार्थ : कहने का अभिप्राय यह है कि छः मुख वाले रुद्राक्ष साक्षात कार्तिकेय स्वरूप है। इनको दक्षिण हाथ में धारण करना चाहिए। ऐसा करने से धारणकर्ता ब्रह्महत्या के पाप से मुक्ति पा जाता है।

7.
सप्तवक्त्रो महाभागो ह्यनंगी नाम नामतः।।
तद्धारणन्मुच्यते हि स्वर्णस्तेयादि पातकैः ।।

भावार्थ : सात मुखी रुद्राक्ष (rudraksha) साक्षात अनंग स्वरूप है, ये महाभाग है। इसके धारणकर्ता को स्वर्ण-चोरी आदि पापों से मुक्ति प्राप्त हो जाती है।

8.
।।अष्टवक्त्रो महासेवः साक्षादेवो विनायकः।।
।।अन्नकूटं तूलकूटं स्वर्णकूटं तथैव च।।
।।दुष्टान्वस्त्रियं वाथ संस्पृशश्च मुरुस्त्रियम्।।
।।एवमादीन पापानि हंति सर्वाणि धारणात्।।
।।विहनास्तस्य प्रणश्यति याति चांते परम् पद्म।।
भवस्येते गुणा सर्वे ह्यष्टवक्त्रस्य धारणात।।

भावार्थ : कहने का अभिप्राय यह है कि हे महासेन ! अष्टमुखी अर्थात् आठ मुखों वाला रुद्राक्ष साक्षात् गणेश जी स्वरूप है। अन्नकूट, तुलाकूट, स्वर्णकूट, दुष्टवंशी स्त्री एवं गुरु पत्नी के स्पर्श आदि पाप इसके धारण मात्र से दूर भागते हैं। एवं इसके धारण करने से अनेकों पाप कर्मों का भी विनाश सम्भव होता है। तथा अन्त में परमपद की प्राप्ति होती है। यह सब कुछ अष्टमुखी रुद्राक्ष के धारण करने से होता है।

9.
।।नववक्त्रो भैरवस्तुं धारयेद्वामबाहुके।।
भुक्तिमुक्ति प्रदः प्रोक्तो मम तुल्यबलो भवेत्।।
।।भ्रूण हत्यासहस्त्राणि ब्रह्महत्या शतानि च।।
सद्यः प्रलयमायांति नववक्त्रस्य धारणात्।।

भावार्थ : नौ मुखी रुद्राक्ष का नाम भैरव है। इसे बाईं भुजा में धारण करना चाहिए। इसके धारणकर्ता को भुक्ति-मुक्ति की प्राप्ति होती है और उसका बल शिवतुल्य हो जाता है। हजारों भ्रूण हत्या एवं सैकड़ों ब्रह्महत्या के पापों से नौ मुखी रुद्राक्ष धारण करने से मुक्ति मिल जाती है।

10.
।।दशवक्त्रस्तु देवेशः साक्षाद्देवो जनार्दना।।
।।ग्रहश्चैत पिशाचाश्च बेताला ब्रह्मराक्षसः।।
।।पन्नगाश्चांपशाक्यति दर्शवक्त्रस्य धारणात्।।

भावार्थ : कहने का अभिप्राय यह है कि दसमुखी रुद्राक्ष साक्षात जनार्दन अर्थात विष्णु स्वरूप है। दस मुखी रुद्राक्ष को धारण करने से ग्रह, पिशाच, वेताल, ब्रह्मराक्षस, पन्नगादि शान्त हो जाते हैं। अर्थात दसमुखी रुद्राक्ष धारण कर्ता के सम्पूर्ण ग्रह शान्त रहते हैं। और भय से मुक्ति प्राप्त होती है।

11.।।वकत्रैकादश रुद्राक्षो रुद्रैकादशकं स्मृतम्।।
।। शिखायां धारयेद्यो वै तस्य पुण्यफलं शृणु।।
।।अश्वमेध सहस्त्रस्य वाजपेयशतस्य च।।
।।गवां शतसहस्त्रस्य सम्यग्दत्तस्य यत्फलम।।
।तत्फलं लभते शीघ्रं वक्त्रेकादशधारणात्।।

भावार्थ : कहने का अभिप्राय यह है कि ग्यारह मुखी रुद्राक्ष साक्षात रुद्र का साप है। जो मनुष्य इसे शिखा में धारण करता है उसे एक हजार अश्वमेघ यज्ञ, एक सौ वाजपेय यज्ञ और सौ हजार गोदान का जो सम्मिलित फल है, वो ग्यारह मुखी रुद्राक्ष के शारण करने से वो फल प्राप्त किया जा सकता है अर्थात इसे धारण करना उत्तम है। इसे धारण करने से फल की प्राप्ति शीघ्र हो जाती है।

12.
।।द्वादशास्यस्य रुद्राक्षास्यैव कर्णे तु धारणात्।।
।।आदि व्यास्तोषिता नित्यं द्वादशास्ये व्यवस्थिताः।।
।।गोमेधे चाश्वमेधे च यत्फल तदवाजुयात्।।
।।श्रृंगिणां शास्त्रिणां चव व्याघ्रदिनां भयं नहि।।
।।न च व्याधिभयंतस्य नैव चाधि प्रकीर्तितः।।
।।न च किचितभयं तस्य न व्याधि प्रर्वतते।।
।।न कुर्ताश्चतभयं तस्य सुखी चैवेश्वरो भवेत्।।
।।हस्त्यश्वसृगमा जर्रि सर्प मूषकदर्दुरान्।।
।।खरांश्चश्व शृगालांश्च हत्वा बहुविद्यानपि।

भावार्थ : कहने का अभिप्राय यह है कि द्वादशमुखी अर्थात बारह मुख वाला रुद्राक्ष (rudraksha) कर्ण में धारण करने से बारहों आदित्य प्रसन्न हो जाते हैं। गोमेध एवं अश्वमेघ यज्ञ के फल की भी प्राप्ति हो जाती है। एवं उसे सींग वाले, शस्त्रधारी और व्याघ्र आदि के भय से भी मुक्ति मिल जाती है।

उसको आधि-व्याधि का भी भय नहीं रहता। उसे न कोई भय और न व्याधि होती है अपितु सर्वत्र सुख होता है तथा वह अधिपति बनता है। हाथी, अश्व, मृग, माजीर, मूषक, दुर्दुर, खर, कुत्ते, शृगाल इत्यादि अनेकों जीवों की हत्या के पाप से मिलने वाले दण्ड से बारह मुखी रुद्राक्ष धारण करने वाला मुक्ति पा जाता है।

13.
।।वक्त्रत्रयोदशो वत्स रुद्राक्षो यदि लभ्यते।।
।।कार्तिकेय समोज्ञेयः सर्वकामार्थ सिद्धिदः।।
।।रसो रसायन चैव तस्य सर्व प्रसिद्धयति।।
।।तस्यैव सर्वभोग्यानि नात्र कार्या विचारणा।।
।मातरं पितरं चैव भ्रातरं वा निहतियः।।
।।मुच्यते सर्व पापेभ्यो धारणातस्य षण्मुख।।

भावार्थ : कहने का अभिप्राय यह है कि हे षण्मुख! यदि तेरह मुखी रुद्राक्ष की प्राप्ति हो जाए तब वह कार्तिकेय के समान सब अर्थ और कामनाओं की पूर्ति करने वाला होता है। उसको रस-रसायन सब सिद्ध होते हैं। उसको सबके सब भोगों की प्राप्ति होती है। इसमें विचार की आवश्यकता शेष नहीं कि जो माता-पिता व भाई को कष्ट पहुंचाता है वह उसके धारण से उस पाप से मुक्ति पा जाता है।

14. (क)
।।चतुर्दशास्यो रुद्राक्षो यदि लभ्येत पुत्रक।
।।धारयेत्स ततं मूर्हिन पिंड शिवस्यतु।।

भावार्थ : कहने का अभिप्राय यह है कि हे पुत्र! यदि चौदह मुख वाला रुद्राक्ष मिल जाए तो उसे सिर पर धारण करना चाहिए क्योंकि चौदहमुखी रुद्राक्ष साक्षात शिव  शरीर स्वरूप होता है।

14. (ख)
।। किं मुने बहुनोक्तेन वर्णनेन पुनः पुनः।।
।। पूज्यते सततं देवैः प्राप्यते च परा गतिः।।
।।रुद्राक्ष एकः शिरसा धार्यो भक्तया द्विजोत्तमैः।।

भावार्थ : कहने का अभिप्राय यह है कि हे मुने! बारम्बार वर्णन करने से क्या लाभ है; एक ही रुद्राक्ष सिर पर भक्ति से धारण से वह भक्त देवताओं द्वारा पूजित होने के पश्चात् परम गति को प्राप्त कर लेता है।

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