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15 मुखी रुद्राक्ष को धारण करने की विधि एवं लाभ

15 mukhi rudraksha
पन्द्रहवां रुद्राक्ष

पुस्तक में वर्णित सब प्रकार के रुद्राक्षों के अलावा कुछ रुद्राक्ष प्राकृतिक रूप से आपस में जुड़े होते हैं। (जैसे जुड़वां केला आपने अवश्य देखा होगा) ये जुड़वां रुद्राक्ष भी वृक्ष पर ही होते हैं।

अत: इस प्रकार से दो रुद्राक्ष जो जुड़वां उत्पन्न होते हैं उन्हें गौरी शंकर कहते हैं। इसी प्रकार यदि तीन रुद्राक्ष एक साथ जुड़े होते हैं तो उसे त्रिजुगी कहते हैं। ये भी बहुत कम मात्रा में पाये जाते हैं अतएव इनका महत्व भी बहुत हो गया है।

यह रुदाक्ष शिव और शक्ति का मिश्रित स्वरूप माना जाता है। जो व्यक्ति एक मुखी रुद्राक्ष प्राप्त करने में असमर्थ हों उनके लिए ये उत्तम वस्तु है। घर में, पूजा गृह में, तिजोरी में मंगल कामना की सिद्धि के लिए इसे रखना लाभदायक है।
15 mukhi rudraksha
1.बारहमुखी रुद्राक्ष धारण करने की विधि संस्कृत श्लोकों, मन्त्रों द्वारा
2.11 मुखी रुद्राक्ष को धारण करने की विधि एवं लाभ
3.10 मुखी रुद्राक्ष को धारण करने की विधि एवं लाभ

15 mukhi rudraksha
इसे शिवलिंग से स्पर्श कराकर धारण करना चाहिए। धारण करते समय’ॐ नमः शिवाय‘ का जाप करते हुए पवित्र स्थान पर बैठकर धारण करें।
श्रद्धा तथा विश्वास और शद्ध मन से धारण करने वाले पर शिव तथा शक्ति दोनों की विशेष कृपा रहती है।
विदेशी विद्वानों का भी मत है कि इसे धारण करने से हिम्मत बनी रहती है और सफलता मिलती है। गौरी शंकर धारण करने वाले को सांसारिक लाभ तो उतने नहीं मिलते जितने रुद्राक्षधारी को मिलते हैं परन्तु आध्यात्मिक लाभ में कोई कमी नहीं होती।

यह भी बाजार में आसानी से उपलब्ध हो जाता है और मूल्य भी अधिक नहीं होता।

गौरीशंकर में असली-नकली की पहचान

प्रायः जो गौरीशंकर नकली बनाकर बेचे जाते हैं वह इस प्रकार से बनाये जाते हैं-दो पंचमखी रुद्राक्षों को लेकर पत्थर पर पानी की सहायता से इस प्रकार से घिसा जाता है कि एक ओर की सारी धारियां घिस जायें और दोनों घिसे हुए दानों को आपस में फेवीकोल या एरलडाइट से जोड़ दिया जाता है।

असली गौरीशंकर की पहचान ये है कि उस पर बनी हुई धारियां प्राकृतिक होती हैं. कुल मिलाकर एक गौरीशंकर पर 7 या 8 धारियां होंगी परन्तु परस्पर उन में दूरी का अन्तर होता है, एक समान दूरी पर नहीं होती। असली गौरीशंकर वज्र के समान होगा। काफी शक्ति लगाने पर भी उसे तोड़ना या दोनों रुद्राक्षों का अलग हो जाना कठिन है।
यदि आप परीक्षण के रूप में उसे तोड़ देंगे तो टूट हुए भाग समान सपाट नहीं होंगे, उनका टूटना प्राकृतिक रूप से विखण्डित होगा। इसी प्रकार यदि आप किसी रुद्राक्ष को भी तोड़ेंगे तो टूटे हुए खण्ड तिरछे-बांके होंगे जैसे कोई पत्थर टूटता है।
त्रिजुगी के असली नकली की पहचान भी उपरोक्त आधार पर की जा सकती है। त्रिजुगी प्राकृतिक रूप से कम उत्पन्न होते हैं इसलिए इनका मूल्य भी गौरीशंकर से अधिक होता है।

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