2 mukhi rudraksha को धारण करने की विधि एवं लाभ

2 mukhi rudraksha

यह दाना सहज ही सुलभ हो जाता है। यह प्राय: चपटे आकार में प्राप्त होता है। इसमें जहां समृद्धि और सुरक्षा करने की शक्ति विद्यमान रहती है, वहीं यह वशीकरण प्रभाव से भी युक्त होता है। स्त्रियों के लिए यह स्वास्थ्य-वर्द्धक और गर्भ-रक्षक माना जाता है।

इस रुद्राक्ष को धारण करने वाला व्यक्ति जनप्रिय, संपन्न, स्वस्थ और देवपूजा का अनुरागी होता है। कुछ ग्रंथों के अनुसार इसमें शिव और शक्ति दोनों की दिव्यता निहित रहती है। इस कारण दाम्पत्य-प्रेम, बंधुत्व और सर्वजन-वशीकरण के क्षेत्र में यह विशेष रूप से प्रभावशाली सिद्ध होता है। जो भी हो, यह अनुभूत सत्य है कि यदि दोमुखी रुद्राक्ष विधिवत् धारण किया जाए, तो व्यवहारिक जगत में सफलता और प्रभाव की सृष्टि करता हे ।

पूजन एवं धारण के लिए इस दाने का स्तवन विशिष्ट मंत्र द्वारा करना चाहिए। जैसे किसी भी दाने (रुद्राक्ष) के लिए यदि उसका विशिष्ट मंत्र प्राप्त नहीं हो रहा हो, तो मात्र ओम नमः शिवाय” का जप ही सर्वोत्तम होता है। दोमखी रुद्राक्ष का विशिष्ट मत्र आगे दिया जाएगा।

पष्यंनपि निषिद्धांश्च तथा श्रृण्वनपि स्मरन्,
जिघ्रांनपि तथा चाश्नप्रलपंनपि संततम्;
कुर्वन्नपि सदा गच्छवि सृजनपि मानव ।
रुद्राक्षधारणादेव सर्वपापर्न लिप्यते।।

निषिद्धों को देखता, सुनता, स्मरण करता हुआ, सूंघता, खाता, प्रलाप करता, गमन और विसर्जन में इन निषिद्ध कर्मों, को करता हुआ रुद्राक्ष धारण करने वाले को पाप नहीं लगता।

रुद्राक्षं वेवलं वापि यत्र कुत्र महामते ,
समंत्रक का मंत्रेण रहित भाववर्जितम् ;
यो वा को नरो भक्तया: धारयेलज्जयापि वा।
सर्वपाप विनिर्मुक्तः सम्यज्ञानमवापनुयात्।।

केवल रुद्राक्ष को भी जहां कहीं मंत्र से या बिना मंत्र के ही, भाव से या बिना भाव के हो; जो व्यक्ति भक्ति से या लज्जा से भी धारण करता है, वो सब पापों से रहित हो भली प्रकार से ज्ञान को प्राप्त करता है।

द्विवक्त्रो देवदेव्यौस्या द्विविधं नाशयेदघम्।

दोमुखी रुद्राक्ष देवी और देवता स्वरूप हैं, जो अनेक पापों को दूर करते हैं।

बिना मंत्रेण यो धत्ते रुद्राक्षं भुवि मानवः ।
स याति नरके घोरे यावविंद्राश्चतुर्दश।।

पृथ्वी पर वास करने वाला जो मनुष्य मंत्र रहित (बिना मंत्र के) रुद्राक्ष धारण करता है, वो घोर नरक में जाकर वास करता है, जब तक इन्द्र पृथ्वी के ऊपर विद्यमान हैं।

2 mukhi rudraksha

स्नाने दाने जपे होमे वैश्वदेवे सुराचने,
प्रायश्चियते तथा श्राद्धे दीक्षाकाले विशेषतः
अरुद्राक्षधरो भूत्वा यत्किचित्कर्म वैदिकम्।
कर्वन्विप्रस्तु मोहेन नरके पतित ध्रुवम्।।

स्न्नान , दान, जप, होम, वैश्यदेव, सुरार्चन, प्रायश्चित, श्राद्ध और विशेषत: दीक्षाकाल में बिना रुद्राक्ष धारण किये जो कुछ भी वैदिक कर्म करता है, वो मोह से नरक में जाता है।

फलस्य दर्शने पुण्यं स्पर्शात्कोटिगुणं भवेत्,
शतकोटि गुणं पुण्यं धारणाल्लभते नरः।
लक्षकोटि सहस्त्रणि लक्षकोटिशतानि च।
जपाच्च लभते नित्यं नात्र कार्य विचारणा।।

रुद्राक्ष के दर्शन मात्र से पुण्य, स्पर्श से करोड गुना पुण्य और धारण करने से उससे भी शो कोटि
गुना पुण्य व्यक्ति को मिलता है। लक्षकोटि और सहस्रलक्ष कोटि गुना फल जप से प्राप्त होता है, जिसमें कम का विचार नहीं किया जाता।

जपध्यानविहीननोपि रुद्राक्षं यदि धारयेत,
सर्वपाप विनिर्मुक्तः स याति परमां गतिम्;
एकवापि हि रुद्राक्षं कृत्वा यत्नेन धारयेत्।
एकविंशतिमुद्धृत्य रुद्रलोके महीयते।।

जप और ध्यान से विहीन भी यदि रुद्राक्ष धारण करे, तो वो सब पापों से विमुक्त होकर परमगति को पाता है। जो एक भी रुद्राक्ष यत्नपूर्वक धारण करता है, वो अपने इक्कीस कुलों का उद्धार करके रुद्रलोक में पहुंचता है।

प्रयाणकाले रुद्राक्ष बंधयित्वा मियेद्यदि,
स रुद्रत्वमवाप्नोति पुनर्जन्म न विद्यते;
रुद्राक्ष धारयेत्कंठे बाह्वोर्वा म्रियतेयदि।
कुलकै विंशमुत्तार्य रुद्रलोके वसेन्नर।।

प्रयाण के समय यदि कोई रुद्राक्ष धारण करके मर जाए, तो वो फिर जन्म को प्राप्त न होकर रुद्रलोक में गमन करता है। कंठ और भुजा में यदि रुद्राक्ष धारण कर मृत्यु हो जाए, तो इक्कीस कुल तार कर रुद्रलोक में निवास करता है।
1.चार मुखी रुद्राक्ष को धारण करने की विधि एवं लाभ
2.एक मुखी रुद्राक्ष धारण करने की विधि संस्कृत श्लोकों, मन्त्रों द्वारा

सहस्त्र धारयेद्यस्तु रुद्राक्षाणां धृतव्रतः।
तं नमति सुरा: सर्वे यथा रुद्रस्थैव सः।।

जो सहस्र रुद्राक्ष को धारण करता है, उसे समस्त देवता प्रणाम करते हैं; वो रुद्र के समान हैं।

रुद्राक्षधारणां च श्रेष्ठं न किंचिदपि विद्यते।
रुद्राक्ष धारण करने से कोई वस्तु श्रेष्ठ नहीं है।
किमत्र बहनो क्तेन वणनेन पुनः पुनः।
रुद्राक्षधारण नित्यं तस्मादेतत्प्रशंस्यते।।

बारंबार कहने और बहुत वर्णन करने से क्या है, रुद्राक्ष नित्य धारण करना।
प्रतिष्ठा होती है।

रुद्राक्षालंकृता ये च ते वै भागवतोत्तमाः।
रुद्राक्ष धारणं कार्य सर्वश्रेऽर्थिभिनृभिः।।

जो रुद्राक्ष से अलंकृत है, वो उत्तम भागवत है। सब कल्याण की इच्छा करन वाला को सदा रुद्राक्ष धारण करना चाहिए।

रुद्राक्षधारी सततं वंदनीयस्तथा नरैः,
उचिछष्टो वा विकर्मस्थो युवतो वा सर्वपातकैः ।
मुच्यते सर्वपापेभ्यो रुद्राक्षस्य तु धारणात्।।

रुद्राक्षधारी मनुष्यों में सदा वंदनीय होता है। नीच और न करने योग्य कर्मों को करता हो या सब पापों से युक्त हो, तो भी रुद्राक्ष के धारण कर लेने से सब पापों से छुटकारा
पा लेता है।

खादंमासं पिबंमद्यं संगछन्नत्यजानपि,
पातकेभ्यो विमुच्येत रुद्राक्षे शिरसे स्थिते;
सर्वयज्ञातपोदान वेदाभ्यासेश्च यत्फलम्।
यत्फलं लभते सद्यो रुद्राक्षस्यु तु धारणात्।।

मांस खाते हुए, मद्य पीते हुए और अनन्तयों का संग करते भी सिर में रुद्राक्ष धारण करने से पातकों से छूट जाता है। सब यज्ञ, तप, दान तथा वेदाभ्यास का जो फल है, वो फल रुद्राक्ष के धारण करने से तत्काल मिलता है।

रुद्राक्षधार को भूत्वा यकिंचित्कर्म वैदिकम्।
कुर्वन्विप्रः सदा भकत्या मह्याजोति तत्फलम्।।

रुद्राक्ष धारण करके जो कुछ कर्म ब्राह्मण वेद के अनुसार करता है, उससे बड़े । पुण्य को प्राप्त करता है।

दो मुखी रुद्राक्ष धारण विधि

2 mukhi rudraksha अर्धनारीश्वर होता है। इसे धारण करने वाले से अर्धनारीश्वर प्रसन्न हो जाते हैं, ऐसी शक्ति दोमुखी रुद्राक्ष के धारण करने की कही गई है।

ॐक्षी ह्रीं क्षों ब्रीं ॐ। इति मंत्रः।
अन्य श्रीदेवदेवेशमन्त्रस्य अत्रिऋषि गायत्री छन्द: देवदेवेशो देवता धर्टी बीजं क्षी

शक्ति: मम चतुर्वर्गसिद्धयर्थे रुद्राक्षधारणार्थे जपे विनियोग:। अत्रिऋषये नम: शिरसि। गायत्री छन्दसे नमो मुखेदेवदेवेशाय नमो हदि। क्षरीं बीजाय नमो गुह्ये। श्री शक्तये नमः पादयोः (करन्यास) ॐ ॐ अंगुष्ठाभ्यां नमः ॐ क्षरी तर्जनीभ्यां स्वाहा, ॐ ह्रीं मध्यमाभ्यां वषट्, ॐ क्षां अनामिकाभ्यां हुं, ॐ श्री कनिष्ठकाभ्यां वौषट् ॐ ॐ करतलकरपृष्ठाभ्यां फट् (अथाङ्गन्यास) ॐ ॐ हृदयाय नमः । ॐ स शिरसे स्वाहा। ॐ ह्रीं शिखायै वषट्। ॐ रौं कवचाय हुं। ॐ ब्रीं ॐ नेत्रत्रयाय वौषट्। ॐ ॐ उ अस्राय फट ।। (अथ ध्यानम्) तपमसो महुताशनलो चनं घनसमानगलं शशिसुप्रभम्। अभय चक्रपिनाकवरान्करैर्दधतमिन्दधरं गिरिशं भजेत् ।।2।।

इति द्विमुखी।।

नोट-दोमुखी रुद्राक्ष देव-देवेश्वर कहलाता है, जो सब कामनाओं को पूर्ण करने वाला होता है। इसे निम्न मंत्र से धारण करना चाहिए

2 COMMENTS

  1. […] भावार्थ : कहने का अभिप्राय यह है कि जो मनुष्य रुद्राक्षधारिणं अर्थात् रुद्राक्ष को धारण करने वाले मनुष्य की जो मनुष्य निन्दा और विवाद एवं उपहास आदि करता है उसकी उत्पत्ति में निश्चय ही संकरता है इसमें कोई सन्देह नहीं है। 1.रुद्राक्ष धारण कैसे करे और उसका लाभ ओर प्रभाव 2.दो मुखी रुद्राक्ष को धारण करने की विधि… […]

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