4 mukhi rudraksha को धारण करने की विधि एवं लाभ

 4 mukhi rudraksha

चारमुखी रुद्राक्ष की समस्त प्रभावशीलता और दिव्यता में वस्तुतः ब्रह्माजी की शक्ति समाहित रहती है। चतुर्मुखी ब्रह्माजी की सृष्टिकारी बौद्धिकता से प्रभावित इस रुद्राक्ष को धारण करने वाला व्यक्ति निश्चय ही विद्या और ज्ञान के क्षेत्र में पर्याप्त लाभ अर्जित करता है। उन विद्यार्थियों के लिए जो पढ़ने में मंद-बुद्धि हों, इसका प्रयोग बहुत अधिक लाभदायक परिणाम देता है। व्यवहारिक जगत में श्री-समृद्धि और सौख्य भी, इसकी साधना से प्राप्त हो सकता है।

चारमुखी रुद्राक्ष रुद्राक्ष संन्यासियों के लिए धर्म और मोक्ष प्रदान करता है। यह अकाल मृत्यु हारी है और दीर्घायु प्रदान करता है। गृहस्थियों के लिए अर्थ और काम का दाता है, तथा मन को शांति प्रदान करता है।

सर्वाश्रमाणां वर्णानां रुद्राक्षाणां च धारणम्।
कर्तव्यं मंत्रस: प्रोक्तं द्विजानां नायवर्णिनाम्।।

सब आश्रम और वर्णों को रुद्राक्ष धारण करना चाहिए। द्विज (ब्राह्मण) को चाहिए कि वो रुद्राक्ष को मंत्रपूर्वक धारण करे अन्यथा नहीं।

चतुर्वक्त्रः स्वयं ब्रह्मा नरहत्यां व्यपोहति।

चतुर्मुखी रुद्राक्ष स्वयं ब्रह्मा का रूप है, जो नर हत्या दूर करता है।

4 mukhi rudraksha
1. एक मुखी रुद्राक्ष धारण करने की विधि संस्कृत श्लोकों, मन्त्रों द्वारा
2. रुद्राक्ष की असली नकली की पहचान और उसके रंग

रुद्राक्षं धारयंपापं कुर्वन्नापि च मानवः।
सर्वतारित पाप्मानं जबालश्रु तिराह हि।।

जाबाल श्रुति कहती है कि रुद्राक्ष धारण कर पाप करते हुए भी सब पाप तर जाते हैं |

रुद्राक्ष तु महात्म्यं जाबालैरादरेण तु,
पठ्यते मुनिभिः सर्वेर्मवा पुत्र तथैव च,
रुद्राक्षस्य फलं चैव त्रिषु लोकेष विश्रतम।

जाबाल श्रुतिया में सब मुनियों द्वारा रुद्राक्ष महालय आदर पूर्वक पढ़ा जाता है। हे पुत्र! रुद्राक्ष महात्म्य तीनों लोकों में विख्यात है।

महासेन कुशग्रंथिपुत्रा जीवादयः परे,
रुद्राक्षस्य तु नैकोऽपि कलामहति षोडशीम्।
वस्य भाले विभूतिर्न नांगे रुद्राक्ष धारणम्।
शंभोर्भवने पूजा स विप्रः श्वपचाधमः।।

हे महासेन, कुशग्रंथि, जीयापोता आदि जो और कितनी ही दूसरी वस्तुएं हैं, वो रुद्राक्ष की सोलहवीं कला को भी नहीं प्राप्त हो सकतीं। जिसके मस्तक में विभूति, अंग में रुद्राक्ष नहीं, और जो शिव मंदिर में जाकर पूजा नहीं करता, वो ब्राह्मण सबसे नीच है।

नातः परतरं स्तोत्रं नातः परतरं व्रतम्।
अक्षय्येषु च दानेषु रुद्राक्षस्तु विशिष्यते।।

सब स्तोत्र इससे परे हैं, सब व्रत इससे परे हैं। दान और नाश न होने वालों में रुद्राक्ष सबसे विशेष है।

ब्राह्मणौ वापि चाण्डालो निर्गुण: सगणोऽपि च।
भस्मरुद्राक्षधारी यः स देवत्वं शिव व्रजेत।।

ब्राह्मण या चाण्डाल, निर्गुण या सगुण कोई भी हो, भस्म रुद्राक्ष धारण करने वाला शिवत्वा को प्राप्त करता है।

भवस्या संपूज्यते नित्यं रुद्राक्षः शंकरात्मकः।
दरिद्रं वापि पुरुषं राजानं कुरुते भुवि।

जो भक्त शंकरात्मक रुद्राक्ष का भक्तिपूर्वक पूजन करता है, वो दरिद्र को भी राजा कर देता है।

चारमुखी रुद्राक्ष धारण करने की विधि

ॐ वां क्रां तां हां ई। इति मन्त्रः। अस्य श्रीब्रह्मामन्त्रस्य भार्गवऋषिः अनुटुप्छन्दः ब्रह्मा देवता वां बीजं क्रां शक्तिः अभीष्टसिद्धयर्थे रुद्राक्षधारणार्थे जपे विनियोगः। भार्गवऋषये नम: शिरसि । अनुष्टुप्छन्दसे नमो मुखे। ब्रह्मादेवतायै नमो हृदि। वां बीजाय नमो गुह्ये। क्रां शक्तये नमः पादयोः।। (अथकरन्यासः) ॐ ॐ अंगुष्ठाभ्यां नमः। ॐ वां तर्जनीभ्यां स्वाहा ॐ क्रां मध्यमाभ्यां वषट् । ॐ तां अनामिकाभ्यां हूँ। ॐ हाँ कनिष्ठिकाभ्यां वौषट् । ॐ ई करतलकरपृष्ठाभ्यां फट् ( अथाङ्गन्यास:) ॐ ॐ हृदयायनमः। वां शिरसे स्वाहा । ॐ क्रां शिखायै वषट्। ॐ तां कवचाय हूँ। ॐ ह्रां नेत्रत्रयाय वौषट्। ॐ ई अस्त्राय फट्। (अथ ध्यानम्) प्रणम्य शिरसा शश्वदष्टवक्त्रं चतुर्मुखम्। गायत्री सहितं देवं नमामि विधिमीश्वरम्।।4।।

इति चतुर्मुखी.॥

 4 mukhi rudraksha  पितामह ब्रह्मा के स्वरूप वाला है। इसके धारण करने से श्री और उत्तम आरोग्य की प्राप्ति होती है। अर्थात इसके धारक का स्वास्थ्य ठीक रहता है। नर-हत्या के पाप को दूर करने की शक्ति इस रुद्राक्ष में है। इसे महाज्ञान, शुद्धि और संपत्ति के निमित्त भी मनुष्य को धारण करना चाहिए।

नोट-चारमुखी  रुद्राक्ष साक्षात् ब्रह्मरूप है। इसके दर्शन-स्पर्श से धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसे निम्न मंत्र से धारण करना चाहिए