5 mukhi rudraksha को धारण करने की विधि एवं लाभ

पांचमुखी रुद्राक्ष 5 mukhi rudraksha

साक्षात् रुद्र का प्रतीक, कालाग्नि-शक्ति का केंद्र; यह रुद्राक्ष अपेक्षाकृत सुलभ होता है। आमतौर पर यही दाना सबसे अधिक पाया जाता है। इसके धारण में एक विशेष प्रतिबंध यह है कि जहां अन्य कोई भी रुद्राक्ष का केवल एक दाना धारण कर लेना पर्याप्त है, वहां पांचमुखी के तीन दाने धारण करने चाहिए।

एक या दो दाने धारण करने से इसका प्रभाव अधूरा और छिन्न हो जाता है।
पांचमुखी दाने को जब भी धारण किया जाए, इसके कम से कम तीन दाने अवश्य होने चाहिए। यह दाना (रुद्राक्ष) शांतिदायक, पापनाशक, गोहत्या, ब्रह्महत्या जैसे पातकों को दूर करने वाला, श्री-समृद्धिदायक और आध्यात्मिक चेतना जागृत करने वाला होता है।
इसके धारण अथवा पूजन हेतु मंत्र आगे बताया जाएगा। रुद्राक्ष सभी वर्गों के पापों का नाश करता है, तथा सभी दु:खों से मुक्ति मिलती है।

5 mukhi rudraksha

रुद्राक्षधारणे लज्जा येषामस्ति, तेषां
नास्ति विनर्मोक्षः संसाराजन्मकोटिभिः।

जिसको रुद्राक्ष धारण करने में लज्जा आती है, उसका संसार से करोड जन्म में भी निस्तार नहीं होता।

हारं वा कटकं वापि सुवर्ण वा द्विजोत्तम्,
रुद्राक्षसहितं भक्तया धारयनरुद्रताभियात।

जो ब्राह्मण हार, कंटक या सुवर्ण को रुद्राक्ष के सहित धारण करता है, वो रुद्रता को प्राप्त होता है।

पंचवक्त्रः स्वयं रुद्रः कालाग्निनमि नामतः,
अभक्ष्यभक्षणोद् भूतैरगम्यागमनोद्भवै,
मुच्यते सर्वपापैस्तु पंचवक्त्रस्य धारणात्।

पंखमुखी रुद्राक्ष स्वयं रुद्र कालाग्नि नामक है। यह अभक्ष्याभक्ष्य और अगम्यागमन के अपराध से मुक्त करता है। अन्य भी सब प्रकार के पाप पांचमुखी रुद्राक्ष के धारण करने से दूर होते हैं।

श्रद्धा न जायते साक्षाद्वेदसिद्धे विमुक्तिदे,
बहूनां जमनामंते महादेवप्रसादतः;
रुद्राक्षधारणे वांछा स्वभावादेव जायते।

वेद सिद्ध रुद्राक्ष धारण में एकाएक श्रद्धा नहीं होती, अपितु बहुजन्मों के अंत में महादेव की कृपा से रुद्राक्ष धारण की स्वाभाविक इच्छा पूरी होती है।

हस्ते चोरसि कंठे च कर्णयोर्मस्तकके तथा।
रुद्राक्षंधारयेद्यस्तु स रुद्रो नात्र संशयः।।
अवध्यः सर्वभूतानां रुद्रवद्धि चरेद्भुवि।
सुराणाम्सुराणामं च वंदनीयो यथा शिवः।।

हाथ, हृदय, कान और मस्तक में जो रुद्राक्ष धारण करता है, वो नि:संदेह शिव है। वो सर्व प्राणियों के वध के आयोग्य होकर भूमि में विचरण करता है। और शिव के समान सुरों व असुरों से वंदनीय होता है।
1.दो मुखी रुद्राक्ष को धारण करने की विधि एवं लाभ
2.
एक मुखी रुद्राक्ष धारण करने की विधि संस्कृत श्लोकों, मन्त्रों द्वारा

रुद्राक्षमालिकाम् कंठे धारयेत् भक्तिवर्जितः।
पापकर्मा तु यो नित्यं स मुक्तः सर्वबंधनात्।।

जो भक्ति रहित होकर भी कंठ में रुद्राक्ष की माला को धारण करता है, वो पापकर्मी भी मुक्त हो जाता है।

पंचमुखी रुद्राक्ष के धारण करने की विधि
ॐ ह्रां आं क्षम्यौं स्वाहा। इति मन्त्रः।
अस्य श्रीमन्त्रस्य ब्रह्मा ऋषिः।

गायत्री छन्द सदाशिवकालाग्निरुद्रो देवता ॐ बीजं स्वार-हा शक्ति: अभीष्टसिद्धयर्थे रुद्राक्षधारणार्थे जपे विनियोगः। ब्रह्मऋषये नमः शिरसि। गायत्री-छन्दसे नमो मुखे। श्रीसदाशिवकालाग्निरुद्रदेवतायै नमो हदि। ॐ बीजाय नमो गुहो । स्वाहा शक्तये नमः पादयोः।। (अथ-करन्यास) ॐ ॐ अंगुष्ठाभ्यां नमः। ॐ ह्रां तर्जनीभ्यां स्वाहा। ॐ आं मध्यामांभ्यां वषट्। ॐ क्षम्यौं अनामिकाभ्यां हुँ। ॐ स्वाहा, कनिष्ठकाभ्यां वौषट्। ॐ हां आं क्षम्यौ स्वाहा, करतलकरपृष्ठाभ्यां फट्।। (अथाङ्गन्यास:) ॐ ॐ हृदयाय नमः। ॐ ह्रां शिरसे स्वाहा । ॐ आं शिखायै वषट्। ॐ क्षम्यौ कवचाय हुं। ॐ स्वाहा नेत्रत्रयाय वौषट् ॐ ह्रां आं म्यौं स्वाहा अस्त्राय फट् (अथ ध्यानम्) हावभावविलासार्द्धनारिकं भीषथार्धमथवा महेश्वरम्। दाशसोत्पालकपालशूलिनं चिन्तये जपविधौ विभूतये।।5।।

।इति पंचमुखी।।

5 mukhi rudraksha पंचब्रह्म स्वरूप वाला है। इसके धारण मात्र से शिवजी संतुष्ट होते हैं। यह अभक्ष्याभक्ष्य और अगम्यागमन के पाप से छुटकारा कराता है। इस पंचमुखी रुद्राक्ष की शक्ति का नाम “रुद्रकालाग्नि’ भी कहा गया है।

यह रुद्राक्ष शारीरिक व्याधियों का शमन करता है, तथा कुंडलिनी जागृत करने में सहायता प्रदान करता है। भूत-प्रेतादि बाधाओं से छुटकारा दिलाता है। इसे किसी भी कार्य की सिद्धि के लिए धारण किया जा सकता है।
नोट-पांचमुखी रुद्राक्ष कालाग्निरुद्ररूप है। सर्व समर्थ मनोकामनाएं पूर्ण करता है और पापों से छुटकारा दिलाता है। इसे निम्न मंत्र द्वारा धारण करना चाहिए

2 COMMENTS

  1. […] 1.पांच मुखी रुद्राक्ष को धारण करने की वि… 2.चार मुखी रुद्राक्ष को धारण करने की विधि एवं लाभ षष्टमुखी (छह मुख वाले) रुद्राक्ष के देवता कार्तिकेय हैं। कई बुद्धिमान इसके देवता गणेश को भी मानते हैं, किन्तु इसके धारण करने से दोनों प्रसन्न होते हैं। छहमुखी रुद्राक्ष को बाएं हाथ में धारण करने से ब्रह्महत्या दूर हो जाने की शक्ति का वर्णन मिलता है। […]

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