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7 mukhi rudraksha को धारण करने की विधि एवं लाभ

सातमुखी रुद्राक्ष 7 mukhi rudraksha

साक्षात् कामरूप, रोग-दारिद्रय-निवारक, समृद्धिकारी यह सातमुखी रुद्राक्ष तप्त-मातृका शक्तियों का केंद्र है। दुर्गाजी के प्रभाव से पूर्ण, ओज, तेज, ज्ञान, बल और सुरक्षा प्रदान करने में यह दाना बहुत प्रभावी सिद्ध हुआ है।

यह दाना प्रायः कम ही उपलब्ध होता है और यदि यह उपलब्ध हो जाए, तो इसे पूरी निष्ठा और विधि के साथ धारण करना चाहिए। सातमुखी रुद्राक्ष से पुत्र-रत्न की प्राप्ति होती है।

7 mukhi rudraksha

रुद्राक्षमहात्म्य मया वक्तुं न शक्यते।
तत्मात्सर्वप्रयत्नेन कुर्याद्रुद्राक्ष धारणम्।।

मैं रुद्राक्ष महात्म्य नहीं कह सकता। अत: सब प्रकार से प्रयत्न करके रुद्राक्ष धारण करना चाहिए।

सप्तवक्त्रो महाभागो हानंगो नाम नामतः,
तद्धारणंमुच्यते हि स्वर्णमतेयादि पातकैः।

1.तीनमुखी रुद्राक्ष को धारण करने की विधि एवं लाभ
2.दो मुखी रुद्राक्ष को धारण करने की विधि एवं लाभ
सातमुखी रुद्राक्ष अनंग नामक है, ये महाभाग है। इसके धारण से स्वर्ण की चोरी आदि के पाप से मुक्ति मिल जाती है।

शिरसा धार्यते कोटि: कर्णयोर्दशकोटय,
शतकोटिर्गले बद्धो मूर्धिन कोटिसहस्रकम्।
अयुत चोपवीते तु लक्षयकौटिभिजे स्थिते;
मणिबंधे तु रुद्राक्षो मोक्षसाधनम् परः।

एक करोड़ गुना फल सिर पर, दस करोड़ गुना फल कान में, सौ करोड़ गुना फल गले में, हजार करोड़ गुना फल मूर्धा में, यज्ञोपवीत में अयुत और भुजाओं में रुद्राक्ष धारण करने का लाख करोड़ गुना फल होता है। मणिबंध में रुद्राक्ष धारण करके मोक्ष साधन में तत्पर होता है।

रुद्राक्षमालयामंत्रो जप्तोऽनंतफलप्रदः,
यस्यांगे नास्ति रुद्राक्ष एकोऽपि बहुपुंयदः;
तस्य जन्म निरर्थ वैः।

रुद्राक्ष माला का मंत्र जपने से अनंत फल का देने वाला होता है। जिनके अंग में बहुत-से पुण्य प्रदान करने वाला एक भी रुद्राक्ष नहीं है, उसका जन्म निरर्थक होता है।

सप्तमुखी रुद्राक्ष के धारण करने की विधि

ॐ हं क्रीं ह्रीं सौं। इति मन्त्रः । अस्य श्रीअनन्त मन्त्रस्य भगवान् ऋषि: गायत्री छन्दः अनन्तो देवता की बीजं ह्रीं शक्ति अभीष्ट सिद्धयर्थे रुद्राक्ष धारणार्थे जपे विनियोगः। भगवान् ऋषये नमः शिरसि। गायत्री छन्दसे नमो मुखे। अनन्त देवतायै नमो हृदि । क्रीं बीजाय नमो गुहो। ह्रीं शक्तये नमः पादयोः (अथ-करन्यासः) ॐ ॐ अंगुष्ठाभ्यां नमः। ॐ ह्रीं तर्जनीभ्यां स्वाहा। ॐ क्री मध्यमाभ्यां वषट्। ॐ ग्लौं अनामिकाभ्यां हुँ, ॐ ह्री कनिष्ठिकाभ्यां वौषट्। ॐ सौं करतलकर पृष्ठाभ्यां फट् (अथाङ्गन्यास) ॐ ॐ हृदयाय नमः। ॐ ह्रीं शिरसे स्वाहा। ॐ क्रीं शिखायै वषट्। ॐ ग्लौं कवचाय हुं। ॐ ह्रीं नेत्रत्रयाय वौषट्। ॐ सौं अस्त्राय फट्। (अथध्यानम्) अनन्त पुण्डरीकाक्षै फणाशतविभूषितम्। विष्वबन्धूक आकारं, कुर्मारुढं प्रपूजयेत्।

॥ इति सप्तमुखी.।।

7 mukhi rudraksha की माता सात माताएं हैं। सूर्य और सप्तऋषि भी इसके देवता हैं। इसके पहनने से महालक्ष्मी की प्राप्ति होती है।
पवित्र होकर धारण करने से इसके द्वारा बड़ी ज्ञान-संपत्ति भी प्राप्त होती है। स्वर्ण की चोरी आदि के पाप से मुक्ति दिलाने की शक्ति इसमें निहित है।
नोट-सात मुख वाला रुद्राक्ष अनंग रूप है, उसे धारण करने से दरिद्र भी ऐश्वर्यशाला हो जाता है। इसे निम्न मंत्र से धारण करना चाहिए
“ओम् हुँ नम:”

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