benefits of rudraksha | रुद्राक्ष की महिमा

रुद्राक्ष की महिमा (Benefits of Rudraksha)

।।सर्वाप्रमाणं वर्णनां रुद्राक्षाणां च धारणम्।।
।।कर्तव्यं मंत्रतः प्रोक्तः द्विजानां नान्यवर्णिनाम।।

उपरोक्त श्लोक से ज्ञात होता है कि रुद्राक्ष की महिमा निराली है। इसे सभी वर्गों के लोगों को अवश्य ही धारण करना चाहिए। ब्राह्मण को चाहिए कि वह रुद्राक्ष को मन्त्रपूर्वक धारण करें। रुद्राक्ष का महत्व इस बात से और बढ़ जाता है कि इसे धारण करने से विपत्तियों का नाश होता है। मन पवित्र और आत्मा शुद्ध होती है।


||रुद्राक्ष धारणादुदो भवत्येव न संशयः।।

उपरोक्त पंक्ति से ज्ञात होता है कि रुद्राक्ष को धारण करने वाला चाहे वह कोई भी क्यों न हो उसे ब्राह्मण समान आदर और सम्मान प्राप्त हो जाता है। उसे ब्राह्मणों की श्रेणी में माना गया है।


।।पष्यन्नपि निषिद्वांश्च तथा श्रृव्वन्नपि स्मरन्।।
।।जिघ्रान्नपि तथा धारनन्प्रतपन्नपि संततम्।।
।।कुर्वन्नपि सदा गच्छन्नि सृजन्नपि मसव।।
।।रुद्रासधारणदेव सर्वयापनं लित्यते।।

उपरोक्त श्लोक से रुद्राक्ष के विषय में पाप कर्मों को बताया गया है। जो व्यक्ति निषिद्धों को देखता, सुनता, स्मरण करता हुआ, सूंघता, खाता, प्रलाप करता, गमन और विसर्जन में इन निषिद्ध कर्मों को करता हुआ रुद्राक्ष धारण करने वालों को पाप नहीं लगता।

अत: रुद्राक्ष धारण करना इसी प्रकार नेष्ट है जिस प्रकार गगा का जल अमृत समान पावन माना जाता है। यमुना का जल कितना भी दूषित क्यों न हो फिर भी यमुना पापकर है। उसकी पूजा होती है। अत: जिस प्रकार से पाप धारण करती यमुना पवित्र मानी जाती है। उसी प्रकार से रुद्राक्ष पापों को हर लेता है। अत: इसे धारण करना सौभाग्य होता है।

Benefits of Rudraksha

 

।।अजेनं मुक्तं देवेन् भुक्तं यन्तु तथा भवेत।।

पीतं रुद्रेण तत्पीतं घ्रात ध्रातं शिवेन तत्।। भावार्थ : कहने का अभिप्राय यह है कि इस फल का भोजन किया तो वह भोजन देवताओं के भोजन करने के समान है। जो उसने पिया सो रुद्र ने उसका पान किया, जो उसने सूंघा सो स्वयं शिव ने सूंघा अर्थात् रुद्राक्ष का सेवन उत्तम है।

।।रुद्राक्षधारणे लज्जा येषामस्ति महामुने।।
||तेषां नास्ति विनर्मोक्षः संसाराजन्मकोटिभिः।।

भावार्थ : कहने का अभिप्राय यह है कि जिसको रुद्राक्ष धारण करने में लज्जा का अनुभव होता है, उसे संसार के करोड़ों जन्मों में भी निस्तार नहीं हो पाता। अत: रुद्राक्ष धारण में लज्जा नहीं करनी चाहिए।

||रुद्राक्षधारिणं दृष्टवा परिवादं करोति यः।।
।।उत्पत्तौ तस्य साँकर्यमस्त्येवेति विनिश्चयः।।

भावार्थ : कहने का अभिप्राय यह है कि जो मनुष्य रुद्राक्षधारिणं अर्थात् रुद्राक्ष को धारण करने वाले मनुष्य की जो मनुष्य निन्दा और विवाद एवं उपहास आदि करता है उसकी उत्पत्ति में निश्चय ही संकरता है इसमें कोई सन्देह नहीं है।
1.रुद्राक्ष धारण कैसे करे और उसका लाभ ओर प्रभाव
2.
दो मुखी रुद्राक्ष को धारण करने की विधि एवं लाभ

।।रुद्राक्षधारणदेव रुद्रो रुद्रात्वामाप्नुयात्।।

मनयः सत्यसंकल्पा ब्रह्मा ब्रह्मत्व भागतः।। भावार्थ : कहने का अभिप्राय यह है कि रुद्राक्ष को यदि रुद्र भी धारण करे तो उसे भी रुद्रत्व की प्राप्ति होती है एवं मुनि सत्य-सकल्प को प्राप्त करते हैं और इसी प्रकार ब्रह्मा भी ब्रह्मत्व को प्राप्त हुए।

||रुद्राक्षधारणा च श्रेष्ठ न किचिदपि विद्यते।।

भावार्थ : कहने का अभिप्राय यह है कि रुद्राक्ष को धारण करने के अलावा अन्य कोई वस्तु श्रेष्ठ नहीं। रुद्राक्ष ही उत्तम होता है, अन्य कोई नहीं।

।।रुद्राक्षधारिणे भक्तया वस्त्र धान्यं ददातियः।।
।।सर्वपाप विनिर्मुक्तः शिवलोकं स गच्छति।।
।।रुद्राक्षधारिणं श्राद्धे भोजयेत विमोदतः।।
।।पितृलोकभवान्योति नात्र कार्या विचारणा।।

भावार्थ : कहने का अभिप्राय यह है कि रुद्राक्षधारी के निमित्त जो वस्त्र एवं धन-धान्य देता है; वह मनुष्य समस्त पापों से मुक्त होकर शिव धाम को प्राप्त हो जाता है। जो व्यक्ति रुद्राक्षधारी मुनि को सप्रेम व निष्ठापूर्वक भोजन कराता है। वह पितृलोक को प्राप्त कर लेता है। उस स्थिति में उस मनुष्य के कर्मों का लेखा-जोखा सब व्यर्थ हो जाता है अर्थात् वो पाप मुक्त हो जाता है।

।।रुद्राक्षधारणः पादौ प्रक्षाल्यादिभिः पिवेन्नरः।।
।।सर्वपापविनिमुक्तः शिवलोक महीयते।।

भावार्थ : कहने का अभिप्राय यह है कि जो मनुष्य रुद्राक्ष धारण किये हुए मुनि अथवा व्यक्ति के चरण धोकर उस जल का पान करेगा तो वह व्यक्ति सर्वपाप मुक्त होकर शिवलोक को प्राप्त कर लेगा।

।।हारं वा कटकं वापि सुवर्ण वा द्विजोतम्।।
।।रुद्राक्षसहितं भक्तया धारयनरुद्रताभियात।।

भावार्थ : कहने का अभिप्राय यह है कि जो ब्राह्मण हार, कंटक या सुवर्ण को रुद्राक्ष के सहित धारण करता है, वह रुद्रता को प्राप्त होता है।

।।रुद्राक्षं केवलं वापि यत्र कुत्र महामते।।
।।समंत्रकं वा मन्त्रेण रहितं भाववर्जितम।।

||यो वा को नरो भक्तया: धारयेलज्जयापि वा।।
॥सर्वपाप विनिमुक्तः सभ्यज्ञानमवापनुयात्।।

भावार्थ : कहने का अभिप्राय यह है कि केवल रुद्राक्षको ही जहाँ कहाँ मन या बिना मन्त्रों के हो, भाव से या बिना भाव केही जो व्यक्ति लज्जा से अथवा लज्जा के बिना भी धारण करता है। वह सब गपों से मुक्ति पा भली प्रकार से ज्ञान की प्रतिक लेता है।

||अहो रुद्राक्षमहात्म्य मया वक्तुं न शक्यते।।
तत्मात्सर्वप्रयत्नेन क्रांदरुद्राक्ष धारणम्।।

भावार्थ : कहने का अभिप्राय यह है कि अहो, रुद्राक्षक महात्म्य नहीं सकता हूं। अत: सब प्रकार से प्रयल कर विधिपूर्वक हो रुद्राक्षको धारण करत रहेर यही उत्तम होता है।

रुद्राक्ष उत्पत्ति का वर्णन
नारद जी एवं नारायण जी के संवाद
||एवंभूतानुभावोऽयं रुद्राक्षो भवताऽनद्य।।
।।वर्णितो महतां पूज्य: कारणं तत्र किं वद।।

भावार्थ : कहने का अभिप्राय यह है कि नारद जो बोले- हे अनद्य जबरुद्राक्ष का इतना प्रभाव है और महान पुरुष भी इसे पूजते हैं और यह सबसे श्रेष्ठ माना गया है। ता आप मुझे इस बात का ज्ञान करायें कि ऐसा क्यों है ? यह आप कहिए।

||एवमेव पुरा पृष्ठो भगवान गिरीशः प्रभुः।।
॥षण्मुखेन च रुद्रस्तं यदुवाच शृणुत्व तत्।।

भावार्थ: कहने का अभिप्राय यह है कि नारायण जी बोले-यही प्रश्न भगवान गिरीश से षण्मुख ने पूछी थी सो इस प्रश्न के उत्तर में जो रुट्रने जो कहा वो सुनो

।।शणु षण्मुख तत्वेन कथयामि समासतः।।
||त्रिपुरो नाम दैस्यस्तु पुराऽसीतसर्वदर्जयः।।

भावार्थ : कहने का अभिप्राय यह है कि भगवान गिरीश बोले – हे षण्मुख! ध्यानपूर्वक सुनो, मैं संक्षेप में बता रहा हूं। त्रिपुर नाम का एक दैत्य बड़ा ही दुर्जेय हो गया था।

।।हतास्तेन सुरा: सर्वे ब्रह्मविष्णवादि देवताः।।
।।सर्वेस्तु कथिते तरिम स्तदाह त्रिपुरं प्रति।।
।।अचिंतयं महाशस्त्रमधोराख्यं मनोहरम्।।
।।सर्वदेवमयं दिव्यं ज्वलंतम घोररूपि यत्।।
||त्रिपुरस्य वधार्थाय देवानां तारणाय च।।
।।सर्वविहनोपशमनमघोरास्तम चिंतयम्।।

भावार्थ : कहने का अभिप्राय यह है कि उसने ब्रह्मा, विष्णु आदि सब देवताओं को अपमानित कर तो समस्त देवताओं ने त्रिपुर की बात मुझ से आ कर कही, तब मैंने देवताओं के अपमान का प्रतिशोध लेने के एवं उनकी रक्षा करने के लिये और सर्वविहन के विनाश के निमित्त सर्वदेवमय द्धिव्य और चलंत महाघोररूपी, अघोर अस्त्र का चिन्तन किया।

|। दिव्यवर्षसहस्त्रं तु चक्षुरुन्मीलितं मया।।
।।पश्चान्माकुलाक्षिम्यः पतिता जलबिन्दतः।।
।।तत्रश्रुबिन्दतो जाता महारुद्राक्ष वृक्षकाः।।
।।ममाजया महासेन सर्वेषां हितकाम्मया।।

भावार्थ : कहने का अभिप्राय यह है कि तब द्धिव्य सहस्त्र वर्ष तक मैंने अपने नेत्र निमीलित किये तो मेरे नेत्रों से जलबिन्दु गिरे। मेरे नेत्रों से गिरे अश्रु बिन्दुओं से महारुद्राक्ष के वृक्ष की उत्पत्ति हुई। हे महासेन ! मेरी आज्ञा से और सबकी हित की कामना से वे रुद्राक्ष पैदा हुए। और त्रिपुर नामक दैत्य की मृत्यु का कारण बने।

रुद्राक्ष का रहस्य एवं प्रकार
।।बभूवुस्ते च रुद्राक्षा अष्टत्रिशत्प्रभेदतः।।
।।सूर्यनेत्र समुद्भूता कपिला द्वादशस्मृताः।।
।।सोमनेत्रोस्थिता: श्वेतास्ते पोडष विद्या: क्रमात्।।

।।बझिनेत्रोदभवाः कृष्णा दश भेदा भवति हि।।
।।श्वेतावर्णश्च रुद्राक्षो जातितो ब्राह्यउच्यते।।
।।क्षात्री रक्तस्तथा भिश्रो वैश्याः कृष्णस्तु शूद्रकः।।

भावार्थ : कहने का अभिप्राय यह है कि रुद्राक्ष 28 प्रकार के भेद वाले हुए। सूर्य नेत्र से उत्पन्न कपिलवण के बारह उत्पन्न हुए। सोमनेत्र से उत्पन्न हुए श्वेत वर्ण वे साला प्रकार के हैं। बह्यनेत्र से उत्पन्न कृष्ण वर्ण वे दस प्रकार के हैं। श्वेत वर्ण का रुद्राक्ष जात
बादाण कहलाया जाता है। रक्तवर्ण का रुद्राक्ष क्षत्रिय, मिश्रित वर्ण का रुद्राक्ष वेश्या कष्ण वर्ण का रुद्राक्ष शूद्र कहलाया जाता है।

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