रुद्राक्ष धारण कैसे करे और उसका लाभ ओर प्रभाव

Rudraksha dharan karne ki widhi

रुद्राक्ष चाहे जिस श्रेणी का हो, वो तभी प्रभावकारी होता है, जब विधिवत् साधना से धारण किया जाए। किसी भी रूप में प्रयोग करने से पूर्व रुद्राक्ष का विधि-विधान के साथ पूजन शोधन अवश्य कर लेना चाहिए।

रुद्राक्ष का प्रयोग मुख्यत: निम्न दो प्रकार से किया जाता है –
1. ।। माला के रूप में धारण करना।।
2.।। दाने के रूप में बाहु या कंठ में धारण करना।।

रुद्राक्ष का तीसरा प्रयोग पूजन का है। केवल शिव-प्रतिमा की भांति देव-स्थान में स्थापित करके उसका नियमित पूजन और दर्शन करना।
इसके अतिरिक्त तांत्रिक-प्रयोगों में भी रुद्राक्ष की उपयोगिता सर्व-स्वीकृत है।
अनेक प्रकार की शारीरिक-मानसिक व्याधियों के निवारण में भी प्रयोग-भेद से रुद्राक्ष परम लाभकारी और प्रभावी होता है।
रुद्राक्ष को चाहे जैसे भी प्रयोग करना हो, उसका शोधन-संस्कार अवश्य कर लेना चाहिए। बिना इसके वो पूर्णरूपेण प्रभावकारी नहीं होता।
उद्देश्य-पूर्ति के लिए रुद्राक्ष का शोधन-संस्कार निम्न रूप से किया जाता है जैसाकि हम पहले भी बता चुके हैं कि सबसे पहले किसी सोमवार को, पुण्य-नक्षत्र में अथवा अन्य किसी भी शुभ मुहूर्त में ही रुद्राक्ष को लाएं। चाहें आप किसी से यों ही लें या बाजार से खरीद कर लाएं अथवा किसी साधु सन्यासी से भेंट स्वरूप लें।
यदि पहले से उसे लाकर रखा गया है, तो भी ऐसे ही शुभ मुहूर्त में उसको शोधन-क्रिया सम्पूर्ण करे ।
उस दिन सबसे पहले शीतल एवं स्वच्छ जल से स्वयं  स्नान करके (सर्दी के दिनों में भी गर्म पानी का प्रयोग न  करे  उसको उसके प्राकृतिक रूप में ही करें) शुद्धतापूर्वक शिव की उपासना करे ।
ध्यान रहे,शिव के उपासक को समदृष्टा होना चाहिए। ब्रह्मा, विष्ण, राम, कृष्ण दुर्गा सबका आदर करते हुए सब में परम शिव तत्व का दर्शन होना चाहिए। मुंडमाला तंत्र में आया है कि –
Rudraksha dharan karne ki widhi

Rudraksha dharan karne ki widhi

रुद्रस्य चिंतनाद्रो विष्णुः स्याद्विष्णुचिंतनात्।
दुर्गायाश्चिंनलाहुर्गा भवत्येय न संशयः।।
यथा शिवस्तथा दुर्गा या दुर्गा विष्णुरेव सः।
अत्र यः कुरूते भेदं स नरो मूढ दुर्मतिः।।
देवी विष्णु शिवादीनामेकत्वं परितियेत्।
भेदकृन्नरकं याति रौरवं नात्र संशयः।।

भगवती श्रुति भी कहती है कि संसार में जो कुछ भी देखा और सुना जाता है, सभी परमशिव तत्त्व है।

सर्व देवात्मको रुद्रः सर्वे देवाः शिवात्मकाः।
रुद्रस्य दक्षिणे पार्वे रविब्रह्मा पयोऽग्नयः।।
वामापावें उमादेवी विष्णुः सोमोऽपिते त्रयः।
या उमा सा स्वयं विष्णुर्यो विष्णुः स हि चंद्रमाः।।
ये नमस्यंति गोविंदं ते नमस्यंति शंकरम्।
येऽर्चयंति हरि भवत्या तेऽर्चयंति वृषध्वजम्।।

वह परमशिव तत्त्व ही सर्वत्र समाया है। वही भयनीय तत्त्व है। वही माननीय शक्ति है। वही पूजनीय तत्त्व है; वही सगुण है, वही विश्वरूप है, पूर्ण चैतन्य स्वरूप है, परम आत्मा है। भगवत्पाद भगवान् आद्य शंकराचार्यजी महाराज कहते हैं कि-

आत्मात्वं गिरिजा मतिः सदचरा प्राणाः शरीरं गृह।
पूजा ते विषयोपभोग रचना निद्रा समाधि स्थितिः।।
संचार, पदयोः प्रदक्षिण विधिः स्तोत्राणि सर्वा गिरो।
यद्ययत्कर्म करोमि तत्तदखिलं शंभो तवाराधनम्।।

1.रुद्राक्ष की असली नकली की पहचान और उसके रंग
2.एक मुखी रुद्राक्ष धारण करने की विधि संस्कृत श्लोकों, मन्त्रों द्वारा
भगवान शिव का पूजन करते-करते जीव जब शिव हो जाता है, वो रोग, द्वेष, लोभ,मोह, मद, मात्सर्य, धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, पुण्य, पाप,सुख-दु:ख, बंधु-मित्र की तेरे-मेरे की भावना से ऊपर उठकर स्वयं इनका साक्षी भूत बन जाता है; इस दृश्यमान जगत का सृष्टा बन जाता है। उस समय केवल वो सत् चित्र, आनंदरूप, स्वयं शिव हो जाता है।
किन्तु इस स्थिति के लिए बड़े धैर्य, अडिग विश्वास एवं दृढ़-श्रद्धा की आवश्यकता है। बिना श्रद्धा के उस परमशिव तत्त्व की प्राप्ति असंभव है।
गीता में कहा है कि “श्रद्धावांल्लभतेज्ञानम् संशयात्मा विनश्यति” अज्ञ और श्रद्धाविहीन, संशययुक्त व्यक्ति अविचल निष्ठा और दृढ़ विश्वास के अभाव में नाश को प्राप्त हो जाता है।
अत: शास्त्र वचनों में अखंड विश्वास रखते हुए तनिक भी इधर-उधर विचलित हुए बिना अपने माता-पिता, गुरु, बंधु सब कुछ उन्हीं को मानते हुए, उन्हीं की शरण में जाना चाहिए। परमशिव तत्त्व की शरण ग्रहण करने से ही त्राण हो सकता है।
भगवति श्रुति कहती हैं, “तस्मै तस्यै नमो नमः” जो हृदय में परमशिव तत्त्व का सर्वत्र दर्शन करते हुए “नमो नम:” कर सकते हैं, वो धन्य हैं। नमः का अर्थ है, न मम। मेरा कुछ नहीं है, सब तुम्हारा है। जो यह कहते रहते हैं, वो ही उस परम शिव, परमतत्त्व, शिवपद की प्राप्ति कर सकते हैं।

श्वेताश्वतर उपनिषद् का वचन है

सर्वा ननशिरो ग्रीव सर्वभूत गुहाश्यः
सर्वव्यापी स भगवांस्तस्मात् सर्वगूतः शिवः।।

(Rudraksha dharan karne ki widhi)

शिव की उपासना करने के पश्चात उनका पूजन करें। तत्पश्चात् रुद्राक्ष के दाने (अथवा माला, जो भी आपको सुलभ हो) को तांबे के किसी पात्र में रखकर (यदि तांबे का पात्र न हो, तो अन्य कोई और पात्र भी लिया जा सकता है, किन्तु विधान तांबे के पात्र का हो है गंगाजल से स्नान कराएं)।

यदि समय पर गंगाजल उपलब्ध न हो, तो नदी, नहर अथवा कुएं का शुद्ध जल भी प्रयोग किया जा सकता है।
यदि उपलब्ध हो जाए तो अष्टगंध अथवा पंचगंध से भी स्नान कराएं।
अब लाल या सफेद कोरा और साफ कपड़ा किसी काष्ठ पर बिछाकर, उस पर रुद्राक्ष स्थापित करें। इसके बाद ठीक शिव-प्रतिमा की भांति चंदन, पुष्प, अक्षत, धूप, दीप आदि प्रज्जवलित कर उसकी पूजा करें।
पूजा करने के पश्चात् (यदि यह सब कार्य आप स्वयं कर रहे हो, तो) पूर्ण श्रद्धा और शांति के साथ 108 (एक सौ आठ) रुद्राक्ष की माला अथवा अन्य किसी माध्यम से 1100 बार निम्न मंत्र का जप करें

“ओम नम: शिवाय”

जप पूरा  हो जाने के पश्चात् 108 बार पुन: इसी मंत्र से आहुतियां देते। हवन-सामग्री (घी और शक्कर मिलाकर) से हवन करें। फिर रुद्राक्ष (या माला) को उठाकर यही मंत्र जपते हुए, उसे शिव-प्रतिमा का स्पर्श कराएं और मस्तक से लगाकर रुचि के अनुसार कंठ या बाहु में धारण कर लें।
रुद्राक्ष-धारण के बाद हवन-कुंड की भस्म का टीका लगाएं और शिव को श्रद्धापूर्वक प्रणाम करें।
ध्यान रहे कि आसन पर विराजमान होने से लेकर रुद्राक्ष धारण करने का क्रिया-कलाप में अविछिन्न रूप से उक्त मंत्र का जप करते रहना चाहिए।
इस प्रकार विधिवत् धारण किया गया रुद्राक्ष या रुद्राक्ष की माला निश्चित रूप से फलदायी होती है।
इस प्रकार धारण किया हुआ रुद्राक्ष रोग, दारिद्रय, दुर्घटना आदि से निवारण में तत्काल चमत्कारी प्रभाव दिखाता है।

त्वमेव भगवन्नेतिच्छवशत्तयोः सरूपयोः।
विश्वं सृजसि पास्यत्सि क्रीडंनूर्ण पटोयथा।।

(Rudraksha dharan widhi)
भगवन् आप ही मकड़ी के समान अपने स्वरूपभूत शिव-शक्ति के रूप में क्रीड़ा करते हुए लीला से हो संसार की रचना, पालन और संहार करते रहते हैं।

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