3 mukhi rudraksha को धारण करने की विधि एवं लाभ

3 mukhi rudraksha

कार्य-क्षेत्र में सिद्धि, प्रयतन  में सफलता, अनुकूल साधनों की प्राप्ति, विद्यार्जन और ज्ञानलाभ के लिए तृतीयमुखी (तीनमुखी) रुद्राक्ष का प्रभाव बहुत थोड़े समय में दिखाई देने लगता है। इसमें सबसे बड़ा गुण यह है कि इस दाने का धारक व्यक्ति यदि तिजारी (ज्वर) से ग्रस्त हो, तो अवश्य ही रोगमुक्त हो जाता है।

आज के भौतिक वैज्ञानिक और आधुनिक एलोपैथिक दवाओं से चिकित्सा करने वाले डाक्टर भी मुक्त-कंठ से इस बात को स्वीकार करते हैं कि तीनमुखी रुद्राक्ष पहना देने मात्र से तिजारी-ज्वर दूर हो जाता है।

इसमें त्रिदेवों “ब्रह्मा, विष्णु और महेश” और त्रिगुणों “सत, रज, तम” और त्रिलोक “आकाश, मर्त्य, पाताल” की दिव्य-शक्तियां निहित रहती हैं, जिनके प्रभाव से यह दाना बहुत ही श्रेष्ठ, पावन और अलौकिक-क्षमता से संपन्न रहता है। इस दाने के पूजन, स्तवन और धारण के लिए मंत्र आगे दिए गए हैं |

रुद्राक्षधारिणं दृष्टवादं करोति यः।
उत्पत्तौ तस्य सांकर्यमस्त्येवेति विनिश्चयः।।
रुद्राक्षधारिणे रक्तया वस्त्रं धांयं ददाति यः।
सर्वपाप विनिर्मुक्त: शिवलोकं स गच्छति।।
रुद्राक्षधारिणं श्राद्धे भोजयेत विमोदतः।
पितृलोक भंवांपोति नात्रं कार्या विचारणा।।

रुद्राक्षधारी को देखकर जो निंदा और विवाद आदि करता है, उसकी उत्पत्ति में निश्चय ही करता है। तथा रुद्राक्षधारी के निमित्त जो वस्त्र और धन्य-धान्य देता है, वो सब पापों से मुक्त होकर शिवलोक को जाता है। जो रुद्राक्षधारी को प्रसन्नतापूर्वक भोजन कराता है, वो पितृलोक को प्राप्त होता है। उसके कर्म नहीं देखे जाते।

त्रिवक्त्रस्त्वनलः साक्षात्स्त्रीहत्यां दहति क्षणात्।
तीनमुखी रुद्राक्ष साक्षात् अनल है।
स्त्री-हत्या का पाप क्षण भर में दूर करता है।
रुद्राक्षः शिरशा ह्ये को धार्यो रुद्रपरैः सदा।
ध्वंसनं सर्वदुःखानां सर्वपाप विमोचनम्।।
कर्णपाशेशिखायां च कंठे हस्ते तथोदरे।
महादेवश्च विष्णुश्च ब्रह्मा तेशां विभूषयः।।
देवाश्चांये तथा भक्तया खलुरद्राक्षधारिणः।।
गोत्रार्षयश्च सर्वेषां कूटस्था मूलरूपिणः।।

शिव के भक्त के लिए एक भी रुद्राक्ष का सिर पर धारण करना सब दुखों का ध्वंस करने वाला और सब पापों का विमोचन करने वाला होता है। कर्ण, शिखा, कण्ठ, हाथ और उदर में महादेव (शिव), विष्णु और ब्रह्मा की विभूति है तथा और भी देवता भक्तिपूर्वक रुद्राक्ष धारण करते हैं। सबके गोत्र ऋषि सब कूटस्थल मूलरूपी श्रौतधर्म में रत रुद्राक्ष के धारण करने वाले हैं।

3 mukhi rudraksha

पुरुषाणां यथा विष्णुग्रहाणां च यथा रवि।
नदीनां तु यथा गंगा मुनीनां कश्यपो यथा।।
उच्चैः श्रवा यथाश्रवानां देवानामीश्वरो यथा।
देवीनां तु यथा गौरी तद्वेश्रेष्ठमिदं भवेत।।

जैसे पुरुषों में विष्णु, ग्रहों में सूर्य, नदियों में गंगा, मुनियों में कश्यप, अश्वों में उच्चैः श्रवा, देवताओं में महादेव, देवियों में गौरी हैं; इसी प्रकार रुद्राक्ष सबसे श्रेष्ठ हैं।

शुचिर्वाप्यशुचिर्वापि तथाऽभक्षस्य भक्षकः,
म्लेच्छो वाप्यथ चाण्डालो युतो वा सर्वपातकैः;
रुद्राक्षधारणादेव स रुद्रो नात्र संशय।।

शुचि अथवा अशुचि और अभक्ष्य का भी पक्षण करने वाला वो मलेच्छ, चाण्डाल या सब पातकों से युक्त हो, तो वो रुद्राक्ष धारण से ही रुद्र हो जाता है। इसमें संदेह नहीं।
1.रुद्राक्ष धारण कैसे करे और उसका लाभ
2.रुद्राक्ष के प्रकार और लाभ

रुद्राक्षधारणम् पुण्यकेन वा सदृसं भवेत,
महाव्रतमिदं प्राहुर्मू नयस्तत्त्वदर्शिनः ।
रुद्राक्ष के धारण का पुण्य किसके समान कहें।
तत्त्वदर्शी मुनियों ने रुद्राक्ष धारण को महाव्रत कहा है।
रुद्राक्ष मस्तकै घृत्वा शिरः स्नान करोति यः,
गंगा स्नान फलं तस्य जायते नात्र संशय।

इसमें संशय नहीं है कि रुद्राक्ष सिर पर धारण करके जो सिर सहित स्नान करता है, उसे गंगा स्नान का फल प्राप्त होता है।

रुद्राक्षाणां तु भद्राक्ष धारणात्स्यांमहाफलम्,
धात्री फल प्रमाणं यत्श्रेष्ठमेतदुदाहृतम्।
समाः स्निग्धा दृढ़ास्तश्त्कंटकैः संयुताः शुभा,
कृमिदष्टांछि भिन्नाष्टकंटकै रहितांस्तथा।
व्रणयुक्तानावृतांश्च षढ्द्राक्ष स्तु वर्जयेत,
स्यमेव कृतद्वारो रुद्राक्षः स्यादिहोत्तमः।

रुद्राक्षों में भद्राक्ष धारण का बड़ा पुण्य है। आंवले के समान आकार वाले रुद्राक्ष श्रेष्ठ हैं। समान स्निग्ध और दृढ़ कंटक उठे हुए रुद्राक्ष शुभ होते हैं।

कृमिदृष्ट, छिन्न-भिन्न, कंटकों से रहित,

व्रणयुक्त, अनावृत्त ये छह प्रकार के रुद्राक्ष धारण न करें। जिसमें स्वय छिद्र हो, वो उत्तम रुद्राक्ष है।

यत्तु पौरुषयत्लेन कृत तन्मध्यम भवेत,
समास्निग्धांदृढ़ांनृतां क्षोमसूत्रेण धारयेत;
सर्वगात्रयेषु साम्येनऽसमानातिविलक्षणा।
निघर्षे हेमलेखाभा यत्र लेखा प्रद्रष्यते,
मतदक्षमत्तम विद्यारस धार्यः शिवपूजकैः ।

वो रुद्राक्ष जिसमें यत्नपूर्वक छिद्र किया गया हो, मध्यम प्रकार का है। समस्निग्ध, दृढ , गोलदाना को रेशम के सूत्र से पहने। सारे शरीर में साम्यतापूर्वक विलक्षण रुद्राक्ष धारण करें। जैसे कसौटी पर घिसने से सुवर्ण की रेखा पड़ जाती है, इसी प्रकार जिस रुद्राक्ष की कसौटी पर रेखा पड़ जाए, वो उत्तम रुद्राक्ष शिव भक्तों को सदा धारण करना चाहिए।

तीनमुखी रुद्राक्ष धारण करने की विधि

ॐ ह्रीं हूंओं। इति मन्त्रः। अस्य श्री अग्निमन्त्रस्य वसिष्ठज ऋषिः। गायत्री छन्दः। अग्नि-देवता ह्रीं बीजं हूं शक्ति चतुर्वर्गसिध्यर्थे रुद्राक्षधारणार्थे जपे विनियोगः। वसिष्ठजऋषये नमः शिरसि। गायत्रीछन्दसे नमो-मुखे, अग्निदेवतायै नमो हदि । ह्रीं बीजाय नमो गुह्ये । हूं शक्तये नमः पादयोः।। (अथकरन्यास:) ॐ ॐ अंगुष्ठाभ्यां नमः। ॐ रं तर्जनीभ्यां स्वाहा। ॐ इं मध्यमाभ्यां वषट् । ॐ ह्रीं अनामिकाभ्यां हुँ। ॐ हूं कनिष्ठकाभ्यां वौषट् ॐ ॐ करतलकरपृष्ठाभ्यां फट्। (अथाङ्गन्यासः) ॐ ॐ हृदयाय नम: ॐ र शिरसे स्वाहा। ॐ शिखायै वषट् । ॐ ह्रीं कवचाय हुं। ॐ हूं नेत्रत्रयाय वौषट् । ॐ ॐ अस्त्राय फट। (अथ ध्यानम्) अष्टशक्ति स्वस्तिकामातिमुच्चैर्दीर्घरभि धरियेतं जपाभम्। हेमाकल्पं पदमसंस्थं त्रिनेत्रं ध्यायेद्वमिं बद्धमौलिं जटाभिः ।।3।।

इति त्रिमुखी.।।

नोट-3 mukhi rudraksha तीन अग्नियों के रूप वाला है। इसके धारण करने से अग्नि की तृप्ति होती है। स्त्री हत्या के पाप से मुक्त कराने की शक्ति-विशेष तीनमुखी रुद्राक्ष में ही है। इससे बुद्धि और विद्या का भी विकास होता है।
तीन मुख वाला रुद्राक्ष सदा साक्षात् साधन का फल देने वाला होता है। समस्त विद्याएं उसके प्रभाव से प्रतिष्ठित होती हैं। इसे निम्न मंत्र से धारण करना चाहिए |

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